आ बंद मुट्ठी में दिल को छुपाए बैठे हैं
है बहाना के मेहंदी लगाए बैठे हैं
मेहंदी हां हां मेहंदी हो
मेहंदी हां हां मेहंदी
टूट के डाली से हाथों पे बिखर जाती है मेहंदी
ये तो मेहंदी है मेहंदी तो रंग लाती है
लोग बागों से इसे तोड़ के लाते हैं
और पत्थर पे इसे शौक़ से पिसवाते हैं मेहंदी
फिर भी होंठों से इसके उफ़ तलक न आती है
ये तो मेहंदी है ...
अपने रस रंग से इस दुनिया को सजाना है
काम मेहंदी का तो गैरों के काम आना है मेहंदी
अपनी खुश्बू से ये सहराओं को महकाती है
ये तो मेहंदी है ...
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